Wednesday, October 28, 2009
तस्वीर बदली
आख़िर पत्रकारिता ने गुगुल्दिः में लोगो को न्याय दिलाया ही जहा नेता बेअसर हो गए थे नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में लोगो को पेंशन की राशिः मिल ही गयी
Monday, October 26, 2009
न्याय के लिए इंतज़ार


जमुई जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर दूर पूर्वी गुगुल्दीह में जो चल रहा है कितना न्याय वाली बात हो सकती है जहा गरीब बुजुर्गो को ब्रिधा पेंसन के लिए पोस्ट मास्टर से प्रताडित होना पड़ता है , गरीबो को सुनने वाला कोई नही ये लोग बीस किलोमीटर doori तय करते है ग्यारह महीने से bhugtan नही हो रहा है khash कर इस naxal prabhavit इस क्षेत्र में जहा इन लोगो के peechhe कोई नही मैंने kavrej के daurn देखा की यहाँ सरकार phel है bhala कैसे होगी न्याय की बात लोग khaki hath wapas लौट आते है bhuekhe pyase , कई bar to घर wapas होने keliye bhade के लिए भीख तक mangne पड़ते है naxal prabhavit gaanwo में ये जो हो रहा है कितना सही है और ग़लत sabko सोचना चाहिए samadhan खोजना चाहिए
Friday, October 16, 2009
आप सभी को हैप्पी दिवाली ...... गणेश और लक्ष्मी जी आप के घर के दरवाजे पर आ गए है आप को बता दे उल्लुदास कह रहे थे उनकी सवारी जरूरी है वो बाजार में नही मिलते मुझको भी पता नही मई भी उन्ही को धुंध रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है चालाकदास की सवारी पर ही लक्ष्मी का आगमन हो सकता है ......................................................... फिलहाल सभी को मेरी शुभकामनाये
Saturday, October 10, 2009
आखीर इसके लिए दोष कौन
एक दैनिक की ख़बर है की नक्सल प्रभावित क्षेत्र के सरकारी विद्यालयो में सरकारी शिक्षक स्कूल नही जाते और नाक्साली उन विद्यालयों में साहित्य के जरिये नाक्सालवाद का पाठ पढ़ा रहे है तो फिर कौन दोषी है नसली ,शाशन या सभी हैरत की बात है की ऐसा कई दिनों से चल रहा है पर कोई कार्यवाई नही होती है ऐसे में हम कह सकते है की चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार चाहे कितने भी बातें हो सच्चाई है की मई अब पूछता हूँ की कैसे कहा जाए की हम इस व्यवस्था में सुरक्षित है फिलहाल बिहार के एक जिले का यही हाल है जहा किसी को ऐसी बातो पर चिंतित होते मैंने नही देखा सच यही है की खामिया के कारन ही मौका मिलता है मै उन सभी लोगो से यह सवाल करता हूँ की कब लोग सही दिसा में प्रयाश कर उन गरीबो को बचा ने का बिदा उठाएंगे जो चारो तरफ़ से लोगो को .........
Tuesday, October 6, 2009
जहा नक्सल जैसी समस्या हो जाहिर सी बात है वहा शासन में कही न कही खामिया है उस में अगर पत्रकारिता भी आम लोगो के लिए न होकर स्वार्थ पर आधारित हो तो समस्या भला कैसे खत्म होगी बिहार के एक जिले में ऐसा ही कुछ चल रहा है जहा अधिकारी से आम लोग तो परेशां है ही अब लोग पत्रकारों से भी लग भये खाने लगे है अक्सर लोग मुझसे कहते है जहा पत्रकार ठेकेदार बन गए है हाल ही में ख़बर मिली की एक पत्रकार ने एक अधिकारी से लैपटॉप की मांग कर दी है फिर क्या कुछ ठेकेदार जो अधिकारी के आदमी है दफ्तर में जाकर पत्रकार को उनके जिम्मेदारी की याद दिला दिया तो मै कहता हूँ कौन जिम्मेदार है इसके लिए शयद वो ख़ुद क्यों की अगर आप इमानदार है तो आप का सम्मान बचेगा इस लिए मै कहता हूँ चल उठ कलम के सिपाही जग निद्रा तोड़ .......... उठ देख समय की पुकार को याद कर बापू को याद कर नेहरू को याद कर सुबह्श को याद कर सब को जिसने हमें यह आजादी दिलाई ....................भूल रहे हो अपने आप को जहा लोगो को उम्मीद है की तुम संभालोगे जहा देश तुझे पुकारती है की बेटे मेरा ख्याल रखना
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