Wednesday, March 9, 2011

jahan

आज हर पल देखता हूँ की दुनिया बदल सी गई है मेरे लिए.
रात में कुछ भी नहीं दिखता सब जानते है 
पर यहाँ तो दिन में भी लोग अंधे के सामान है
किस बाजार में बेचू मै
यहाँ तो कोई खरीदार ही नहीं जो लगा सके कीमत मेरी 
मै नहीं हूँ  कीमती  लेकिन  हूँ मै भी चीज भी 
इंतज़ार था की वो आयेंगे पूछेंगे कीमत पर
सब के सब ......
ऐसा नहीं की कोई जनता हियानहीं पर हैरान हूँ की कोई आया ही नहीं
फिर भी खरा हूँ इंतज़ार में ....
अब ऐसा भी नहीं की मै कोई वास्तु हूँ पर उस जैसे ही हूँ 
जन है पर बेजान हूँ,
जुबान है पर बेजुबान हूँ 
सब है पर कुछ भी नहीं भरा हूँ पर खली हूँ
यही तकलीफ है की मै हूँ और कोई नहीं 
या सब है मै नहीं 
चिलाता रहा पर किसी ने नहीं सुना 
अब भला मै कैसे गलत हूँ 
भरे बाजार में मै तमासबिं हूँ 
मै आदमी हूँ पर लाचार हूँ 
मै आदमी हूँ पर लाचार हूँ 
हम  भी चाहते है एक दिवाली मनाये  पर 
मै क्या करू लाचार हूँ. 

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