Sunday, December 13, 2009

एक अनोखा प्रयास नक्सल इलाके जमुई में


एक बार फिर गुगुल्दिह मेरे दिमाग में एक छाप छोड़ दिया है जहा एक चाइल्ड क्लब के बच्चो ने अपने पहल से एक बल विवाह को रोकवा कर वो कर दिया जो सबके बस की बात नही हो सकती है हैरत की बात है की जहा सरकारी तंत्र इस कुरीति को रोकने में असफल रही है वही चाइल्ड क्लब के बच्चो ने धर्मेन्द्र जिसका उम्र मात्र बारह साल है उसे शाद न करने की सलाह दी उसे समझाया और उसके माता पिता को भी समझाया की बचपन में शादी नही कर देनी चाहिए मामले की जानकारी लेने जब मै उसके घर गया तो उसके पिता का कहना था की चुकी वह शराब पिता है और जिंदगी का कोई भरोषा नही तो वह चाहता है की वो धर्मेन्द्र की शादी करा दे लेकिन तब क्या बल विवाह के खिलाफ जंग छोड़ देने वाले चाइल्ड क्लब के लोगो ने एक प्रयास किया और सफलता भी मिल गई और शादी टाल दी गई हाला की इन छोटे छोटे बच्चो को डर है की कही उनके साथ ग़लत न हो पर अब इन बच्चो के साथ और लोग भी अब सामने आने लगे है इस क्लब के प्रेसिडेंट निहारिका के अनुसार आज भी इस क्षेत्र में बल विवाह का प्रचालन है जिसे रोकना बहुत ही जरूरी है जिसके लिए उनके क्लब के बच्चे तत्पर है पर मीडिया की मदद बहुत चाहिए क्यों की और जिंदगी बर्बाद न हो सके

Sunday, December 6, 2009

Friday, December 4, 2009

ये भी एक भूल है




किसी महान के प्रतिमा स्थल पर कुछ ऐसा जो वर्जित हो अगर होता रहे तो क्या समझा जा जाए हम बात कर रहे है एक महान क्रांतिकारी की जिनके प्रतिमा स्थल पर प्रतिमा तो नही लगा पर अतिक्रमण जरूर हो चुका है वह सराब बिकता है जुआ खेला जाता है और भी कई तरह के गलत कम होते है लेकिन हैरत की बात है की वह हर दें गुजरने वाले नेता और अधिकारी को चिंता नही रहती है की उसका सम्मान कैसे वापस लौटाया जाए हैरत की बात है मै अक्सर लोगो से पूछता हूँ की कैसे होगा लेकिन कोई नही मिलता जो जबाब दे सके

Friday, November 13, 2009

सच

सच ही कहा गया है की इन्सान कुछ भी कर ले सचाई सामने आ ही जाते है हकीकत है की लोग बनावटी पन कर हालत मोड़ देते है पर कितने दिनों तक सचाई छिपी जा सकती है मई कहता हूँ सामने आकर सामना करना जरूरी है सच चाहे कितनी ही भी कड़वी हो सच सच है और झूठ झूठ मेरे संग अगर सच बताना हो तो मेल करे @जीमेल पर मै आप के साथ हूँ एक पत्रकार होने के नाते

Wednesday, November 11, 2009

एक सवाल सबके लिए

एक उदासी पिछले कई दिनों से मेरा पीछा नही छोड़ नही रही है कभी कभी तो लगता है की सब कुछ दिखावा है पर क्या कर सकता हूँ ऐसे जगह पर पत्रकारिता करना कम चुनौती नही है जहा सिर्फ़ भ्रस्टाचार है अभी हल के दिनों में मै जिले के एक गाँव में कवरेज़ के लिए गया जहा एक महिला पिछले कई दिनों से न्याय के लिए जनता दरबार जिला से राजधानी तक चक्कर लगा चुकी है पर न्याय नही मिला जब की वह सही है उसे न्याय मिलना चाहिए पर नही ..... उसे अधिकारी न्याय न दिला कर एक दोषी को वो सम्मान दे दिया अब सवाल उठता है की क्या जमुई जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एस तरह क्या सही शासन की कल्पना उचित है .....वो महिला के पति कारपेंटर है गरीब है अपनी हक़ के लिए कहा कहा नही दौडी पर सच हारती दिख रही है उसके अनुसार उसे न्याय के लिए क़र्ज़ लेना पड़ा और आज वह क़र्ज़ में डूब चुकी है पर हैरत की बात है की जिले में तैनात अधिकारी मनमानी कर , सब कुछ मिटटी में मिला दिए .... वैसी कई घटना आज भी जमुई में है जहा डी ऍम भी चुप हो कर सब कुछ करा रहे है अब भला कैसे कहा जाएगा की मनमोहन और नीतिश का सपना सच होगा मैंने कई लोगो से पूछा की समाधान क्या है पर जबाब नही मिला अब आप ही बताये की क्या हो सकता है

Wednesday, October 28, 2009

तस्वीर बदली

आख़िर पत्रकारिता ने गुगुल्दिः में लोगो को न्याय दिलाया ही जहा नेता बेअसर हो गए थे नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में लोगो को पेंशन की राशिः मिल ही गयी

Monday, October 26, 2009

न्याय के लिए इंतज़ार




जमुई जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर दूर पूर्वी गुगुल्दीह में जो चल रहा है कितना न्याय वाली बात हो सकती है जहा गरीब बुजुर्गो को ब्रिधा पेंसन के लिए पोस्ट मास्टर से प्रताडित होना पड़ता है , गरीबो को सुनने वाला कोई नही ये लोग बीस किलोमीटर doori तय करते है ग्यारह महीने से bhugtan नही हो रहा है khash कर इस naxal prabhavit इस क्षेत्र में जहा इन लोगो के peechhe कोई नही मैंने kavrej के daurn देखा की यहाँ सरकार phel है bhala कैसे होगी न्याय की बात लोग khaki hath wapas लौट आते है bhuekhe pyase , कई bar to घर wapas होने keliye bhade के लिए भीख तक mangne पड़ते है naxal prabhavit gaanwo में ये जो हो रहा है कितना सही है और ग़लत sabko सोचना चाहिए samadhan खोजना चाहिए

Friday, October 16, 2009

आप सभी को हैप्पी दिवाली ...... गणेश और लक्ष्मी जी आप के घर के दरवाजे पर आ गए है आप को बता दे उल्लुदास कह रहे थे उनकी सवारी जरूरी है वो बाजार में नही मिलते मुझको भी पता नही मई भी उन्ही को धुंध रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है चालाकदास की सवारी पर ही लक्ष्मी का आगमन हो सकता है ......................................................... फिलहाल सभी को मेरी शुभकामनाये

Tuesday, October 13, 2009

जमुई देवघर सड़क मार्ग पर कतौना लाइन होटल पर अक्सर दिन भर का थका मारा

Saturday, October 10, 2009

आखीर इसके लिए दोष कौन

एक दैनिक की ख़बर है की नक्सल प्रभावित क्षेत्र के सरकारी विद्यालयो में सरकारी शिक्षक स्कूल नही जाते और नाक्साली उन विद्यालयों में साहित्य के जरिये नाक्सालवाद का पाठ पढ़ा रहे है तो फिर कौन दोषी है नसली ,शाशन या सभी हैरत की बात है की ऐसा कई दिनों से चल रहा है पर कोई कार्यवाई नही होती है ऐसे में हम कह सकते है की चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार चाहे कितने भी बातें हो सच्चाई है की मई अब पूछता हूँ की कैसे कहा जाए की हम इस व्यवस्था में सुरक्षित है फिलहाल बिहार के एक जिले का यही हाल है जहा किसी को ऐसी बातो पर चिंतित होते मैंने नही देखा सच यही है की खामिया के कारन ही मौका मिलता है मै उन सभी लोगो से यह सवाल करता हूँ की कब लोग सही दिसा में प्रयाश कर उन गरीबो को बचा ने का बिदा उठाएंगे जो चारो तरफ़ से लोगो को .........

Tuesday, October 6, 2009

जहा नक्सल जैसी समस्या हो जाहिर सी बात है वहा शासन में कही न कही खामिया है उस में अगर पत्रकारिता भी आम लोगो के लिए न होकर स्वार्थ पर आधारित हो तो समस्या भला कैसे खत्म होगी बिहार के एक जिले में ऐसा ही कुछ चल रहा है जहा अधिकारी से आम लोग तो परेशां है ही अब लोग पत्रकारों से भी लग भये खाने लगे है अक्सर लोग मुझसे कहते है जहा पत्रकार ठेकेदार बन गए है हाल ही में ख़बर मिली की एक पत्रकार ने एक अधिकारी से लैपटॉप की मांग कर दी है फिर क्या कुछ ठेकेदार जो अधिकारी के आदमी है दफ्तर में जाकर पत्रकार को उनके जिम्मेदारी की याद दिला दिया तो मै कहता हूँ कौन जिम्मेदार है इसके लिए शयद वो ख़ुद क्यों की अगर आप इमानदार है तो आप का सम्मान बचेगा इस लिए मै कहता हूँ चल उठ कलम के सिपाही जग निद्रा तोड़ .......... उठ देख समय की पुकार को याद कर बापू को याद कर नेहरू को याद कर सुबह्श को याद कर सब को जिसने हमें यह आजादी दिलाई ....................भूल रहे हो अपने आप को जहा लोगो को उम्मीद है की तुम संभालोगे जहा देश तुझे पुकारती है की बेटे मेरा ख्याल रखना
किसी भी चीज को जब तक कोई नजदीक से जानने की कोशिश नही करता है तब तक किसी भी नतीजे पर जन जल्द बजी ही होती है , जैसा की मुझे लग रहा है की वो किसी ....... ....... रही है

Tuesday, September 1, 2009

अजनबी शहर में .......... अजनबी लोग कैसे .......... कहू दास्ताँ........मै चला था कुछ सोच कर ...लेकिन हकीकत है की आज भी अजनबी हूँ पहचान बढ़ी लोग जुटे ......पर सब के सब मतलब के किससे कहू क्या कहू कैसे कहू .....जो मिला उसे कहे लेकिन वो किसी और को .....ऐ मेरे दोस्त जबाब दो

Wednesday, August 26, 2009

आज आख़िर मंत्री ने पत्रकारों को बुला कर सहयोग मांगी , खासकर ई टी वि को और एक दैनिक को जिसने पत्रकारों को कल बैठक में से निकले जाने की ख़बर खास रूप में दिखाई थी , सच यह पत्रकारों की छोटी जित ही पर एक जित तो रही ....... भला लोकतंत्र में चौथा स्तम्भ का भी तो स्थान है

Tuesday, August 25, 2009

आज जो कुछ भी हुआ वो पत्रकारिता का अपमान है , राज्य के मंत्री ने पत्रकारों को बहार जाने को कहा , सुखाड़ को लेकर बैठक और मीडिया को भाग लेने से मनाही भला कैसी पारदर्शिता क्यों पि आर डी ने पत्रकारों को बुलाया था , क्या सूबे के मुख्यमंत्री की यही सकारात्मक सोच का नतीजा है सच में आज पत्रकार मर्माहत है क्या इसी के लिए लोग आपमान सहेंगे हैरत की बात है की मंत्री भी उसी बिभाग के है जहा पत्रकारों से सीधा संपर्क है यानि सुचना प्रसारण मंत्री , लोगो के मन में यह सवाल है की क्या पत्रकार की यही सम्मान देने का वडा है , सच में ठीक ही कहा गया है लेखनी के सिपाही सिर्फ़ अपमान के घूंट पी रहे है चाहे सरकार किसी की रहे जी हा हम बात कर रहे है बिहार के जमुई जिले की सम्हार्नाल्या में बैठक की जहा बैठे पत्रकारों को उठा दिया गया .......................................................कैसे होगी सम्मान की रक्षा , लेखनी को कैसे दे मजबूती

Sunday, August 23, 2009

कैसे कोई पत्रकार नक्सल प्रभावित क्षेत्र पत्रकारिता करता है वह ख़ुद वही जानता है बिहार के एक नक्सल जिले में जहा वह रिपोर्टिंग करता है वह झारखण्ड से सटा है आए दिन एक चैनल के लिए ख़बर बनता है खासकर जब नक्सल अटैक होता है तब सूचना के लिए मारामारी है सबसे बुरा तब जब पुलिश कुछ भी बताती नही है एसपी , डी ऍम सब चुप रहते है ....... हाल के दिनों में एक पोलिश गस्ती दल पर नाक्साली हमले में जवान शहीद हो गए वह रिपोर्टर क्या करे ...... अपने प्रोफ्फेसन के साथ नयाय चाहता है

Saturday, August 22, 2009

कैसे चलू कदम साथ नही देता.... कैसे देखू नजर साथ नही देती तुम अगर साथ दे तो हर चीज हो हमारी अगर तुम नही तो ज़मी है खाली असम है खालीये हकीकत है दुनिया वाले दोस्त भी दुश्मन भी सिर्फ़ हम अकेले .......... मेरी हर चीज हो तुम्हारी और हो तुम्हारी मेरी ...... मेरी हर मंजिल तुम्ही से है शुरू और अंत करा दो यकीं देखाना चाहता हूँ करा दो यकीं मुझे मै
मेरी क्या गलती थी ..... मै तो पत्रकारिता करने चला था , भला दलाली कैसे करू मेरे घर वाले कहते है पैसा कमाओ ..... लेकिन मै यह कहानी है मेरे एक दोस्त कि .....जो चला था एक अभियान चलने लेकिन मिल गया खाक में ॥ घर वालो का गुस्सा ...... गाड़ी लोन पर , कैमरा ख़राब भला कैसे हो एक पत्रकार कि पत्रकारिता

Friday, August 21, 2009

tum

तुम कहती हो .... मै नही शामिल हूँ तो फिर क्यों जिंदगी में आई ...तुम कहती हो मै थोड़े ही ॥ कई सवालों के बिच सिर्फ़ तुम ने........ तुझे देखने के बाद या तुम नही दिखती तब के हालत पर गौर करो बचपन से अभी तक न डाला ऐसा .....तुम साथ देती रहो एक सच है मै दुनिया को जबाब दू की अपने आप को मै खुश कैसे रखू ,तेरे हर सवाल का जबाब देना चाहता हूँ पर तुम ..... एक दर्द लिए फिर रहा हूँ उन galeyon में ...... सवालों को लेकर ..... सुनाने के लिए ...... jabab के लिए मिटना चाहता हूँ , अनजाने डगर पर चल पड़ा हर पल तलाश है उसकी .... इंतजार ही वो आए बैठे सुने सुनाये
हम ख़बर छाप देंगे ........... नही सर ...... मै बर्बाद हो जाऊँगा .......तो कुछ खर्च करो ........क्या सर ..........विज्ञापन दो ......ठीक है कितना पैसा लगेगा ...........दो हजार.........................................................................................., यही है एक भ्रस्त वयस्था का पत्रकरिता जो छोटे इलाको में चल रहा है जहाँ प्रबंधन का दबाब में सब कुछ चल रहा है , कही पत्रकार ठेकेदार है तो कही कच्छ और ......

illegal

यहाँ लोग चाहते है की भ्रस्ताचार के खिलाफ जगह पेपर वाले लोग देकर उनकी आवाज बने लेकिन हैरत की बात है की लेखनी कुंद हो गई हैक्यों क्यों आखिर कौन जिम्मेदार है शायद हम सभी